मन रीझ न यों...

दिल के दरमियाँ PRESENTS मन ! अपनी कुहनी नहीं टिका उन संबंधों के शूलों पर जिनकी गलबहियों से तेरे मानवपन का दम घुटता हो। जो आए और छील जाए कोमल मूरत मृदु भावों की तेरी गठरी को दे बैठे बस एक दिशा बिखरावों की मन ! बाँध न अपनी हर नौका ऐसी तरंग के कूलों पर बस सिर्फ़ ढहाने की ख़ाति... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ० कुअँर बेचैन
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[19 Feb 2009 03:04 AM]

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