धर्म की तिजारत
कुछ और व्यंग मनमोहन जी के संग्रह से. उनकी तुर्बत पे एक दिया भी नहीं, जिनके खूँ से जला चिरागे वतन. जगमगाते हैं मकबरे उनके, बेचते रहे जो शहीदों का कफ़न. मवालियों को न देखा करो हिकारत से, न जाने कौन सा गुंडा वजीर बन जाए. ख़ुद बाग़ के माली ने गुलशन की यह...
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Suresh Chnadra Gupta
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[19 Feb 2009 00:28 AM]



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