प्रेम जनमेजय को व्यंग्यश्री-2009 सम्मान

प्रेम जनमेजय आध्ुनिक जीवन विसंगतियों से भरा हुआ है और बाजारवाद ने तो हमारे जीवन की स्वाभाविकता को नष्ट कर दिया है। व्यंग्यकार अपने समय का समीक्षक होता है इस कारण समाज में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। व्यंग्यकार का कर्म मनोरंजन करना कतई नहीं है, उसका कर्म तो... [पूरी पोस्ट]
writer प्रेम जनमेजय
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[18 Feb 2009 10:44 AM]

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