चलो, व्यूह रचें

जिरह मां की कविता प्रतीक्षा पढ़ते हुए ये बातें 26 दिसंबर 95 की रात लिखी थीं। प्रतीक्षा यहां पढ़ी जा सकती है। निःशब्द होकर बिखर जाना, किसी ताजा खबर की आस में सचमुच बहुत बड़ी भ्रांति है सच है कि सपने प्यारे होते हैं लेकिन वासंती बयार के साथ उन्हें उड़ा देना... [पूरी पोस्ट]
writer अनुराग अन्वेषी
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[18 Feb 2009 02:45 AM]

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