तुम तो ऐसे नहीं थे.......
जानवर*~*~*~*~*~* यही वफ़ा का सिला है, तो कोई बात नहीं, ये दर्द तुमने दिया है, तो कोई बात नहीं. यहीं बहुत है की तुम देखते हो "साहिल" से, मेरी कश्ती डूब रही है, तो कोई बात नहीं. रखा था आशियाना-ए-दिल में छूपा कर तुमको, वो घर तुमने छोड़ दिया है, तो कोई बात...
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गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
वो तेरा नाम था.....
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[17 Feb 2009 07:50 AM]



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