मुक्तिद्वार की सीढियां ...[कहानी] श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
हेलो " " हेलो... आज इतने दिनों बाद " " हाँ आज तुम्हारा स्मरण बहुत आवेग के साथ कर रहा था " " सच पूछो तो मैं भी कल से ...." " क्लासेस ...? डिस्टर्ब तो नहीं ..... " " नहीं .. नहीं ... अभी फ्री हूँ. स्टूडेंट्स एनुअल फंक्शन की रिहर्सल में बिजी हैं . इतने...
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श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
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[17 Feb 2009 05:55 AM]



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