पेड़ के जज़्बात

कबीरा खडा बाज़ार में ..... एक अच्छी कविता काल के सारे दबावों को व्यक्त करती हुई कहीं ना कहीं बची रहती है । का़ग़्ज़ पर मुमकिन नहीं होता तो यह ज़ेहन में बची रहती है ,जहाँ हथियार पराजित हो जाया करते हैं । पहले कविता संग्रह ’गुल्लक’ से की गई शुरुआत ’इतनी तो है जगह’ तक आते - आते रुप... [पूरी पोस्ट]
writer sareetha
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[16 Feb 2009 22:52 PM]

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