यह कर्ण और कविता का जन्म है ...

अमृता प्रीतम की याद में..... अचानक --एक कागज आगे सरकता है उसके कांपते हुए हाथो को देखता है एक अंग जलता है ,एक अंग पिघलता है उसे एक अजनबी गंध आती है और उसका हाथ बदन में उतर आई लकीरों को छूता है .. हाथ रुकता है बदन सिसकता है एक लम्बी लकीर टूटती सी लगती है फ़िर जन्म और मौत की दोहरी... [पूरी पोस्ट]
writer रंजना [रंजू भाटिया]
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[16 Feb 2009 01:25 AM]

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