मैं तो बेचैन ...

कबीरा खडा बाज़ार में ..... मैं तो बेचैन हकीकत को ज़ुबाँ देता हूँ । आप कहते हैं,बगावत को हवा देता हूँ । निज़ाम कैसा ये , खुशबू को नहीं आज़ादी ? सुर्ख फ़ूलों को , दहकने की दुआ देता हूँ । उसने मासूम परिन्दों के उजाड़े सपने , अपनी पलकों में कफ़स , जिनको सदा देता हूँ । मेरा ज़्मीर था , कल... [पूरी पोस्ट]
writer sareetha
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[16 Feb 2009 01:04 AM]

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