हर मकान ओट ढूँढते न फिरो
कसमसाहट सी ,खलबली सी है, शाम फिरसे धुली-धुली सी है, रूठ कर लापता हुआ है दिन, रात कर चुगली,अब भली सी है, ग़म,गिले,गालियाँ,ग़ुबार,गरज; ग़ल्तियाँ,गाज,गनीमत,ग़फ़लत, दिल-दबा-तार्रूफ़-ए-ज़ुबाँ तो करो, हर मकान ओट ढूँढते न फिरो। आज फिर ख़ाक हो गया मक़सद, और क...
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RUPAK_REWA
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[15 Feb 2009 11:23 AM]



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