ख्वाहिश.....
जानवर*~*~*~*~*~*~* काश मैं तेरे हसीन हाथों का कँगन होता, तु बड़े चाव से.....बड़े मन के साथ, अपनी नाजुक सी कलाई में चढ़ाती मुझको, और बेताबी से फुरसत के लम्हों में, तु किसी सोच में डूबकर जो घुमाती मुझको, मैं तेरे हाथ की "खुशबू" से महक-सा जाता, जब कभी मुड़...
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गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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[14 Feb 2009 03:50 AM]



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