मां

जिरह मां की कविता 'गूलर के फूल' पढ़ते हुए 6 फरवरी 95 की रात 2 बजे मेरी प्रतिक्रिया यह थी। 'गूलर के फूल' 'चांदनी आग है' (मां की कविताओं का संग्रह) में शामिल है। कविता यहां पढ़ी जा सकती है। गूलर के फूल की तलाश में तुम बि-ख-र-ती गयी और बुनती रही हमारे लिए बर... [पूरी पोस्ट]
writer अनुराग अन्वेषी
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[14 Feb 2009 00:27 AM]

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