टेसू
दंगा हो रहा शहर में मन करता है फ़ूलों पर फ़िर लिखूं कविताएं हालांकि हास्यास्पद लगेगा साइकिल के हैंडिल पर लगाऊं सुर्ख डाली कर्फ़्यू लगी गलियों से चीखता हुआ गुज़रुं मैं निहत्था कवि हूं देवियों - सज्जनों ! टेसू खूब खिले मार्च के महीने में । - नरेन्द्र गौड [...
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sareetha
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[13 Feb 2009 20:06 PM]



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