सांभर वाली झील
एड़ी नीचे कील, फील गुड । दे पतंग को ढील, फील गुड ॥ तेरे खातिर रात पूष की बड़ा ले गयी चील, फील गुड । राणाजी के ट्रस्ट खुल गए धक्के खाएँ भील, फील गुड । दिखने में ज़्यादा दिखती पर तौलें हलकी खील, फील गुड । राजनीति में कहाँ मधुरता सांभर वाली झील, फील गुड ।...
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joshi kavirai
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[13 Feb 2009 13:28 PM]



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