चिंता
हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह, एक पुरुष, भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह। नीचे जल था ऊपर हिम था, एक तरल था एक सघन, एक तत्त्व की ही प्रधानता-कहो उसे जड़ या चेतन। दूर-दूर तक विस्तृत था हिम स्तब्ध उसी के हृदय-समान, नीरवता-सी शि...
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आशुतोष कुमार राय
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[13 Feb 2009 05:48 AM]



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