सारे छंद बिखर जाते हैं
नाम काव्य का लेकर जब जब
होते हैं भाषण, लफ़्फ़ाज़ी
अखबारी कतरन या कविता
में दिखता न फ़र्क जरा भी
और प्रशंसा के अफ़साने
जहाँ अपेक्षित बन जाते हैं
मित्र ! वहाँ कविता क्या होती ?
सारे छंद बिखर जाते हैं इधर उधर की जोड़-तोड़ की
पैबंदों वाली रचनायें
क्या क्या पढ़ ल...
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राकेश खंडेलवाल
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[12 Feb 2009 20:23 PM]



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