व्यंग्य---ज्यों-ज्यों बूड़े श्याम रंग

प्रेम जनमेजय ज्यों-ज्यों बूड़े श्याम रंग गर्मियों की इतवार की अलसाई सुबह का समय था और चढ़ती ध्ूप, मक्खियों की भिन्न-भिन्न तथा चिडि़यों की चांय चांय मेरे जैसे अलसाए लोंगों को वैसे ही बेचैन कर रही थी जैसे बढ़ती हुई मुद्रास्पफीति की दर से आजकल भारत सरकार बेचैन है ।... [पूरी पोस्ट]
writer प्रेम जनमेजय
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[12 Feb 2009 10:28 AM]

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