अब तो शिकवा न करना मुझसे
पैदा होते ही लग जाता है ठप्पा जिस पर मनहूस का भेदभाव बरता जाता है जिसकी परवरिश मैं हर पल हर जरूरत के लिए मारना पड़ता है मन को बदन पर चुभती अनगिनत आँखें भूखे गिद्ध की तरह अपनों की परायों की हर कदम पर बंदिशें उम्र के फेलाव के साथ बढता, बंदिशों का सिलसिल...
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शिवराज गूजर.
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[12 Feb 2009 08:21 AM]



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