इंतज़ार

दृष्टिकोण आँखें कैसी तो थक जाती हैं राह तकते तकते। और फिर दरवाज़े पर खामोश आहटें सुनाई देने लगती हैं। चहल कदमी और किसी के आने का अंदेशा। बाहर साये रंग पहनने लगते हैं.....फिर जाने कैसे तो लगता है यह वही है जिसका इंतज़ार था। एक आशावाद, कि धुंधली लकीरे साफ होकर द... [पूरी पोस्ट]
writer Beji
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[12 Feb 2009 04:20 AM]

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