जब सपने हरजाई निकले
हमने हर आघात ह्रदय पर सहन किया है हंसते हंसते लेकिन टूटा मन किरचौं में, जब सपने हरजाई निकले नैनों की गलियों में हमने, फूल बिछा भेजा आमंत्रण आश्वासन की पुरवाई को किया द्वार का तोरण वन्दन पलकों के कालीन बना कर तत्पर हुए पगतली करने लेकिन इन राहों पर मुड़...
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राकेश खंडेलवाल
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[11 Feb 2009 20:39 PM]



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