मचलता पारा हुआ है आदमी

जोशी कविराय  - Joshi Kavirai वक्त का मारा हुआ है आदमी । तंत्र से हारा हुआ है आदमी । बस चुनावों के समय उनके लिए काम का नारा हुआ है आदमी । वोट दें, ना दें, चुने जायेंगे वो क्यूँ यूँ बेचारा हुआ है आदमी । कब से घर सर पर उठाये फिर रहा एक बंजारा हुआ है आदमी । क़ैद मुट्ठी में नहीं कर पा... [पूरी पोस्ट]
writer joshi kavirai
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[11 Feb 2009 09:45 AM]

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