टाइम खराब किया
खचाखच भरी बस में चढ़कर चुपचाप खड़ी एक कोने में थी, वह न कोई संगी-साथी खुद में ही निमग्न । सोच रही थी जाने क्या-क्या? पल-पल झुकाती नजरें अौर उठाती । एक पल मुड़कर देखती कंडक्टर को फिर वापिस चेहरा घुमाती । जाने क्या कहना चाहती थी पर कह नहीं पाती थी । दे...
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राम प्रकाश द्विवेदी
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[11 Feb 2009 04:54 AM]



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