डा. अनुराग के बचपन पर कराह उठा यह पचपन

युं ही, निट्ठल्ला... जैसे जैसे डा. अनुराग की पिछली ज़बरदस्त पोस्ट को बाँचता जाता, दिल से.. हमारे वाले दिल से, कराह उठ रही थी, “हाय अमर तुम न हुये ।” ऎ भाई कोई यहीं खुन्नुस न निकाल लेना, कि “ अगर होते तो, क्या उखाड़ लेते ?” एकदम सच बात है, मैं क्या कर लेता.. ? मैं बचपन में... [पूरी पोस्ट]
writer डा० अमर कुमार
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[10 Feb 2009 16:30 PM]

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