वाबस्ता तेरे ज़िक्र से मेरे ख़याल सारे

फुरसत के रातदिन वाबस्ता* तेरे ज़िक्र से मेरे ख़याल सारे लिखती है ये कलम भी तेरे जमाल सारे देखा मेरा जलाल ज़िंदगी के इम्तेहां ने तू ही मेरा जवाब है तू ही सवाल सारे ख्वाब में माँगी थी काग़ज़ की एक कश्ती मेरी आँख से गिरे हैं तेरे शलाल सारे मैने तुझे भुलाया कितनी ही शिद... [पूरी पोस्ट]
writer Shafaq
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[09 Feb 2009 01:44 AM]

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