शाम , समंदर और खलिश

राजेश गुप्ता आपसे रूबरू आज फ़िर शाम को लहरों ने भिगोया तट को आज फ़िर ओढा आसमा ने लालिमा के घूंघट को आज फ़िर डूब गया सूरज समंदर के कटोरे में आज फ़िर कसक उठी और लोहा सा पिघला दिल में आज फ़िर नाम उसका होठों तक आया, रह गया आज फ़िर पलकों के भीतर यादों का दरिया बह गया आज फ़िर गहरा हुआ ब... [पूरी पोस्ट]
writer WindEnergyMan

poetry

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[08 Feb 2009 20:57 PM]

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