गांव वाले घर मे अम्मा सब कुछ थी कुछ भी न होकर

शब्द सृजन सुबह सवेरे जग जाती थी, गाय धू कर दूध बिलोकर. गांव वाले घर में अम्मा, सब कुछ थी कुछ भी न होकर. दूध मलाई और पिटाई, तक उसके हाथों से खाई. रोज सवेरे वह कहती थी, उठो धूप सर पे है आई. उपले पाथ रही अम्मा को, याद करूं हूं अब मैं रोकर. गांव वाले घर में अम्मा,... [पूरी पोस्ट]
writer योगेश समदर्शी
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[08 Feb 2009 05:45 AM]

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