बसंत
गेहूं की बाली है,अमवा की डाली है चारों ओर बहती पवन मतवाली है। पीताम्बरी सरसों कैसे लजाती है , झूम झूम कैसे शरमाती इतराती है। कोयलिया काली बावरी हुई जाती है , कुहू कुहू करती सबको तडपाती है। नई कली कैसे मंद मंद मुस्काती है तरु तरु नई कोपल नई आस जगाती ह...
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Poonam
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[07 Feb 2009 09:34 AM]



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