तूफान से पहले
कहीं अब्रू पे हैं महराबे इबादत के शिकन कहीं मिम्बर (इमाम) की जुबाँ पर है बगावत के सुखन (क्रांति की बातें) कहीं आवाजें अजाँ में हैं वह पैगामे दुहुल (संवाद देने वाले ढोल) सुनके जिनको सफेदा (नमाजी) में पड़ी है हलचल कहीं मीनारों पे दुश्मन के लिए दारे हैं...
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डा. फीरोज़ अहमद
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[06 Feb 2009 20:51 PM]



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