चार बूंद प्यार....

काहे को ब्याहे बिदेस.... गंगा जल नहीं, प्यार की आखरी बूंदें सहेज ली हैं धरकनो में लोक - परलोक तर जाने के लिए... तुम और प्यार मत करना बह जायेगा छलक कर आंखों से ... चार बूंद काफ़ी हैं मुक्ति के लिए.... दो जिंदगी भर हर पल तुम पर मिटने के लिए दो अन्तिम साँस में हलक और अधर पर लगा... [पूरी पोस्ट]
writer neera
views
38
upvote
3
downvote
0
rating
3
comments
11
[05 Feb 2009 18:31 PM]

Free Vedic Astrology From Astrobix