चार बूंद प्यार....
गंगा जल नहीं, प्यार की आखरी बूंदें सहेज ली हैं धरकनो में लोक - परलोक तर जाने के लिए... तुम और प्यार मत करना बह जायेगा छलक कर आंखों से ... चार बूंद काफ़ी हैं मुक्ति के लिए.... दो जिंदगी भर हर पल तुम पर मिटने के लिए दो अन्तिम साँस में हलक और अधर पर लगा...
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neera
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[05 Feb 2009 18:31 PM]



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