खुशबू जो तेरी ज़ुल्फ के रेशों से उड़ी है

फुरसत के रातदिन खुशबू जो तेरी ज़ुल्फ के रेशों से उड़ी है उल्फ़त की एक कली मेरे दिल में भी खिली है आँचल के तेरे रंग फ़िज़ाओं में घुले हैं मुद्दत के बाद शाम आज मुझसे मिली है बढ़ जाए ना ये आग के जल जायें हम दोनो मेरे दिल की तिशनगी को जो हवा ये मिली है रुक रुक के बरसना... [पूरी पोस्ट]
writer Shafaq
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[29 Jan 2009 04:14 AM]

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