तू नहीं तो तेरी याद ही काफ़ी है

फुरसत के रातदिन तू नहीं तो तेरी याद ही काफ़ी है इक उमर के लिए इंतज़ार काफ़ी है खामोशी उसकी मेरी शोख बातों पर हमें तो इतना ही ऐतबार काफ़ी है मेरे ज़िक्र पर आँखें छलकी होंगी उसका बागीचा गुलज़ार काफ़ी है लोग कैसे कैसे सवाल करते हैं उसका दिल पहले आज़ार काफ़ी है ना फ़िज़... [पूरी पोस्ट]
writer Shafaq
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[30 Jan 2009 04:58 AM]

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