झीनी सी कोहरे की चादर
झीनी सी कोहरे की चादर सुबह-शिशु को गरमास ओढाये है शिशु के कपोलों की लाली छिपती नहीं है कम्बल में अरुणाई की मादकता सुमन-सौरभ के भार से लदी छलकी जाती है जग में और जग की निष्ठुर क्रीडा चल रही है अनवरत ......................
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swati
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[05 Feb 2009 06:58 AM]



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