मज़हबी पागलपन

मेरा चिट्ठा कई दिनों से ज़हन में ये खयाल आ रहा था कि क्या आदमी का मज़हबी होना ज़रूरी है, किसी एक मज़हब का गुलाम होना ज़रूरी है? क्यों नहीं इंसान अपनी समझ या अक्ल से चीज़ों के बारे में सोचता है, क्यों वो बिना किसी मज़हब के अच्छा इंसान नहीं हो सकता है, क्यों उसे किसी गुर... [पूरी पोस्ट]
writer खयाल
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[04 Feb 2009 22:33 PM]

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