मेरी समझ नहीं कि ये कमाल कर सकूं

नया प्रयत्न हर शख्स अपने साथ मैं खुशहाल कर सकूं मेरी समझ नहीं कि ये कमाल कर सकूं । फैली हैं अब समाज में अनगिन बुराइयाँ है लालसा कि बद को मैं बेहाल कर सकूँ। फेकूँ निकाल हिय के अन्धकार द्वेष को कटुता के जी का आज मैं जंजाल कर सकूँ। है प्रार्थना कि नाथ वृहद शक्ति दो... [पूरी पोस्ट]
writer हिमांशु
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[04 Feb 2009 05:42 AM]

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