फंड की लागत का रोना, बैंकों का डर छिपाने का बहाना
मित्रों, किसी संस्थान की नौकरी और अपने ब्लॉग का फर्क मुझे अब कायदे से समझ में आने लगा है। हो यह रहा है कि अक्सर मेरी लिखी रिपोर्ट या विश्लेषण न किन वजहों से संपादकगण नहीं छापते। लेकिन मुझे लगता है कि मैं अनर्गल कतई नहीं लिखता। तो, अब ऐसी अनछपी खबरें...
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अनिल रघुराज
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[04 Feb 2009 03:46 AM]



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