हजार पच्यासीवें का बाप [बस्तर में जारी नक्सलवाद के समर्थकों के खिलाफ] - राजीव रंजन प्रसाद
दिल्ली में बैठा हूँ और सुबह सुबह एक प्रतिष्ठित अखबार भौंक गया है, बस्तर के जंगलों में क्रांति हो रही है। लेखिका पोथी पढ पढ कर पंडित हैं, कलकत्ता से बस्तर देखती हैं। दिख भी सकता है, गिद्ध की दृष्टि प्रसिद्ध है, कुछ भी देख लेते हैं। वैसे लाशों और गिद्ध...
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राजीव रंजन प्रसाद
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[04 Feb 2009 01:42 AM]



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