GAZAL

राही मासूम रज़ा का साहित्य बदले हैं तो यूँ बदले हैं बिगड़े हुए हालात शहरों में है वह भीड़ न वह शोर न वह बात है सुबह का संगीत न गीतों से भरी रात देखो कि यह है अहद-ए-फिरंगी की करामात जलती हुई करघे का धुआँ आने लगा है मलमल भी बिलायत से यहाँ आने लगा है... [पूरी पोस्ट]
writer डा. फीरोज़ अहमद
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[03 Feb 2009 10:57 AM]

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