ग़ज़ल
बोलता नहीं लेकिन बड़बड़ाता तो है। सच होंठ पर लेकिन आता तो है। अर्श शौक से अब ओले उड़ेल दे, मूंडे गए सरों के पास छाता तो है। तेरी मंज़िल मिले न मिले क्या पता, है तय ये रस्ता कहीं जाता तो है। फिज़ाओं में यूँ ही नहीं है हलचल, तीर चुपके से कोई चलाता तो ह...
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प्रकाश बादल
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[03 Feb 2009 09:49 AM]



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