कैसे देख पाता ?

नया प्रयत्न गुजरता था मैं जब भी दरवाजे से खुला रहता था वह, खड़ा रहता था कोई मेरी प्रतीक्षा में, दरवाजे के भीतर से एक मुस्कराहट चीरती भीड़ को चली आती थी मेरे पास, मैं अवश उस मुस्कुराहट से बँधा रूप-मग्न चलता जाता था अपने भीतर एक उजास का अनुभव करते हुए। उस समय मेरे म... [पूरी पोस्ट]
writer हिमांशु
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[02 Feb 2009 18:00 PM]

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