"...पराजय के बाद "
कल तक जो धूप थी आँगन में पसरी पसरी ; एक खामोश सी उदासी हो गयी है , गमलों में लगे डेलिया , अपने तमाम रंगों के बावजूद अब कुछ गुनगुनाते नहीं ..... पडौसी की दीवार पर बैठी गौरय्या जो कल तक खूब बतियाती फिरती थी आज वहीं दूर बैठी टिकटिकी लगाये बस ...... देखत...
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सागर
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[02 Feb 2009 07:19 AM]



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