GAZAL
इक टीस है जो साँस है इक दर्द बदन है हर गाँव के सीने में जईफी की चुभन है हर खोशा-ए-गन्दुम (गेहू की बाल) की निगाहों में थकन है हर खेत की गर्दन में मुँडेरों की रसन (रस्सी) है हर सागर-ए-गुल (फूलों का जाम) दीदा-ए-हैराँ (हैरान आँखें) की तरह है हर सुबह-ए-वत...
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डा. फीरोज़ अहमद
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[01 Feb 2009 00:05 AM]



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