सलीम बुढ्ढे पर मत रो

नवागंतुक नहीं जी , अब डर नहीं लगता , दर्द नहीं होता और आंसू भी दीखते नहीं पलको पर , अब कुछ टूटता भी है तो बे-आवाज टूटता है करना क्या है ? बस पड़े पड़े समय को पकड़ कर रुई बना लेता हूँ , और कातता हूँ रोज धागे , सूत और रेशम के - कल भेजी थी उसके लिए बना कर रेशमी... [पूरी पोस्ट]
writer आलोक शंकर
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[31 Jan 2009 16:38 PM]

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