GAZAL

राही मासूम रज़ा का साहित्य रो देते हैं जब हाथ बनाते हैं निवाले हर सिम्त (दिशा) हैं सरगोशियाँ ताने हुए भाले ख्वाबों में भी चलते हैं फिरंगी के रिसाले केंचुल से निकलने को तड़प उठते हैं काले बिखरे हैं इधर और उधर ढँूढ रहे हैं हम शाम-ए-गुलामी की सहर ढँूढ रहे हैं... [पूरी पोस्ट]
writer डा. फीरोज़ अहमद
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[31 Jan 2009 12:13 PM]

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