बसन्त
सुन चांदनी मेरे आंगन में सांझ ढले रात में छिपकर किरणों से रवि की तू एक बार आना। ओ बदरिया मेरी राह में सूरज की आड़ में मोरों की झनकार लिए तुम मिल जाना। ऐ हवा मेरे गांव की चौपाल पर फागुन की रात में महक लिये साथ में तू चली आना। अरे बसन्त चांदनी रात में...
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betuki@bloger.com
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[31 Jan 2009 04:38 AM]



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