anubhav
माँ! तुम कब तक यूँ ही कमलासना बनी वीणा- वादन करती रहोगी? कभी-कभी अपने भक्तों की ओर भी तो निहारो देखो-- आज तुम्हारे भक्त सर्वाधिक उपेक्षित दीन-हीन जी रहे हैं भोगों के पुजारी महिमा-मंडित हैं साहित्य संगीत कला के पुजारी रोटी-रोज़ी को भटक रहे हैं क्या अपर...
[पूरी पोस्ट]
शोभा
19
0
0
0
3
[30 Jan 2009 23:13 PM]



Shuffle








