GAZAL

राही मासूम रज़ा का साहित्य बर्दाश्त की हद से बहुत आगे है मुसीबत हर लम्हा कोई बात है हर रोज इक आफत फाकों के करीब आ गये गोरों की बदौलत लानी ही पड़ेगी हमें अब कोई कयामत मैदान में जाँ बेच के आना ही पड़ेगा अँग्रेज को इस मुल्क से जाना ही पड़ेगा... [पूरी पोस्ट]
writer डा. फीरोज़ अहमद
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[28 Jan 2009 14:12 PM]

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