प्रतिज्ञा, पलायनावस्था व शाहजहांपुर

काकोरी के शहीद अब हमलोग पिछली कड़ी  से आगे  बढ़ते हैं.. इन्हीं विचारों में निमग्न यमुना तट पर बड़ी देर तक घूमता रहा। ध्यान आया कि धर्मशाला चल कर ताला तोड़ सामान निकालूं । फिर विचारा धर्मशाला जाने से गोली चलेगी, व्यर्थ में खून होगा । अभी ठीक नहीं । अकेले बदला... [पूरी पोस्ट]
writer डा. अमर कुमार
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[28 Jan 2009 12:13 PM]

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