"फिर कैसे वो खुशी दे गई..."

रात है सुहानी सी दिन भी तो था हसीन फिर क्यों लगता है ये मौसम अन्जाना सा, रास्ते पर है वीरानीं महफ़िल भी तो है सूनी सी फिर क्यों छाई है हम पर मदहोशी सी, गुम न है कोई बस है इक पुकार की दूरी पर फिर क्यों न निकलतीं है हमसे इक आवाज कोई, कुछ न चाहा था हमने... [पूरी पोस्ट]
writer lokendra
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[28 Jan 2009 12:01 PM]

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