होता स्वयं जगत परिणाम

कुन्दकुन्द कहान क्रमबद्ध को मानते ही फेरफार (बदलाव) करने की दृष्टि छूट जाती हैं सामान्य द्रव्य पर दृष्टि जाती ही है , यही पुरुषार्थ है ....! करने फरने का है ही कहाँ ? करुँ करुँ की दृष्टी ही छोडनी है और अपने ज्ञायक भाव से जोड़नी है | मनुष्य भव में यही एक काम करने योग... [पूरी पोस्ट]
writer प्रदीप मानोरिया
views
19
upvote
0
downvote
0
rating
0
comments
1
[28 Jan 2009 02:55 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix