निरर्थक है निरर्थकता का बोध

एक हिंदुस्तानी की डायरी अपने बहुत सारे पुराने साथियों में देखता हूं कि वे अब भी अजीब किस्म के अपराध-बोध और ग्लानि के भाव के साथ जिए जा रहे हैं कि देश-समाज के लिए जो कभी करने की सोची थी, अब कुछ नहीं कर पा रहे हैं। एकाध धरना-प्रदर्शन में हिस्सेदारी, और कुछ नहीं। बस, नौकरी-चाक... [पूरी पोस्ट]
writer अनिल रघुराज

अंदर की दुनिया

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[26 Jan 2009 20:03 PM]

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